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बेमेतरा में ग्रीष्मकालीन उड़द खेती का बढ़ा रकबा, किसानों को बेहतर आय की नई उम्मीद

📍 प्रशासनिक |📍 बेमेतरा | jun/13/2026| ✍️ Prashant Kumar Narware
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Summer urad and moong cultivation is transforming agriculture in Bemetara district. Increased adoption of scientific farming techniques and quality seeds has significantly boosted cultivation area and farmers' income prospects.


बेमेतरा जिले में ग्रीष्मकालीन उड़द एवं मूंग की खेती किसानों के लिए आय बढ़ाने और कृषि को अधिक लाभकारी बनाने का मजबूत माध्यम बनकर उभर रही है। कृषि विभाग के मार्गदर्शन, उन्नत बीजों की उपलब्धता और वैज्ञानिक खेती की तकनीकों के प्रभाव से जिले में दलहन फसलों का रकबा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह बदलाव न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रहा है, बल्कि टिकाऊ कृषि प्रणाली को भी नई दिशा दे रहा है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले वर्ष जहां केवल 285 हेक्टेयर क्षेत्र में ग्रीष्मकालीन उड़द और मूंग की खेती की गई थी, वहीं वर्ष 2026 में यह रकबा बढ़कर 1191 हेक्टेयर तक पहुंच गया है। इनमें लगभग 1000 हेक्टेयर क्षेत्र में 1280 किसानों द्वारा ग्रीष्मकालीन उड़द का प्रदर्शन किया गया। यह उपलब्धि दर्शाती है कि किसान अब परंपरागत खेती से आगे बढ़कर वैज्ञानिक कृषि तकनीकों को तेजी से अपना रहे हैं।

इस सकारात्मक बदलाव की मिसाल ग्राम गाड़ाभाठा के किसान श्री अमर सिंह साहू और ग्राम बिजागोंड के किसान श्री चंद्रकुमार कुंभकार बने हैं। दोनों किसानों ने पहली बार ग्रीष्मकालीन उड़द की खेती अपनाई और अब बेहतर उत्पादन की उम्मीद के साथ सफलता की नई कहानी लिख रहे हैं।
अमर सिंह साहू ने कृषि विभाग के सहयोग से लगभग 1.5 एकड़ भूमि में उन्नत किस्म के बीजों का उपयोग करते हुए 21 अप्रैल 2026 को कतार पद्धति से बुवाई की। समय पर सिंचाई और पोषण प्रबंधन के कारण उनकी फसल वर्तमान में बेहद अच्छी स्थिति में है। अनुमान है कि उन्हें 7 से 8 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन प्राप्त हो सकता है। पहले केवल पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहने वाले अमर सिंह अब दलहन खेती को भविष्य की बेहतर आय का साधन मान रहे हैं।
इसी प्रकार ग्राम बिजागोंड के किसान श्री चंद्रकुमार कुंभकार ने 12 अप्रैल 2026 को वैज्ञानिक पद्धति से उड़द की बुवाई की। नियमित तकनीकी मार्गदर्शन और आधुनिक कृषि उपायों के कारण उनकी फसल घनी और स्वस्थ अवस्था में है। उन्हें 8 से 9 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन मिलने की संभावना है। उनकी सफलता से गांव के अन्य किसानों का भी उत्साह बढ़ा है और वे भी दलहन खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार ग्रीष्मकालीन उड़द की खेती केवल उत्पादन और आय बढ़ाने तक सीमित नहीं है। दलहन फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर उसकी उर्वरता बढ़ाती हैं, जिससे आगामी फसलों को भी लाभ मिलता है। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है और कृषि अधिक टिकाऊ बनती है। आवश्यकता पड़ने पर इन फसलों का उपयोग हरी खाद के रूप में भी किया जा सकता है, जो भूमि की गुणवत्ता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

बेमेतरा जिले में ग्रीष्मकालीन उड़द की बढ़ती खेती आत्मनिर्भर कृषि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। अमर सिंह साहू और चंद्रकुमार कुंभकार जैसे किसानों की सफलता यह साबित करती है कि सही मार्गदर्शन, गुणवत्तापूर्ण बीज और वैज्ञानिक तकनीक के माध्यम से किसान कम समय में बेहतर उत्पादन और अधिक आय प्राप्त कर सकते हैं। यह मॉडल आने वाले वर्षों में जिले के हजारों किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है।

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FAQs

Q: बेमेतरा में इस वर्ष उड़द-मूंग खेती का रकबा कितना पहुंचा?
Ans: लगभग 1191 हेक्टेयर।

Q: पिछले वर्ष यह रकबा कितना था?
Ans: लगभग 285 हेक्टेयर।

Q: ग्रीष्मकालीन उड़द का प्रदर्शन कितने किसानों ने किया?
Ans: 1280 किसानों ने।

Q: अमर सिंह साहू को कितना उत्पादन मिलने की संभावना है?
Ans: लगभग 7 से 8 क्विंटल प्रति एकड़।

Q: चंद्रकुमार कुंभकार को कितना उत्पादन मिलने का अनुमान है?
Ans: लगभग 8 से 9 क्विंटल प्रति एकड़।

Q: दलहन फसलें मिट्टी के लिए कैसे लाभकारी हैं?
Ans: वे नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं।

Q: ग्रीष्मकालीन उड़द खेती का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
Ans: बेहतर आय, अधिक उत्पादन और मृदा स्वास्थ्य में सुधार।

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